Wednesday, 11 July 2012

खुद-ब-खुद लोकप्रिय हो जाते थे खय्याम के गीत



खय्याम के जन्मदिन की फाइल फोटो
कभी-कभी, उमराव जान जैसी कई फ़िल्मों में बेहतरीन संगीत देनेवाले मशूहर संगीतकार खय्याम को जन्मदिन की हार्दिक बधाई..
हिंदी सिनेमा को बेहतरीन संगीत से नवाजने वाले खय्याम पंजाब के रहनेवाले हैं. खय्याम अपनी छोटी सी उम्र में ही दिल्ली आ गये थे. वहां उन्होंने संगीत की तालीम ली. शुरू से ही उनकी दिलचस्पी पढ़ाई में नहीं थी. यही वजह है कि वे संगीत सीखने के लिए दिल्ली से लाहौर पहुंच गये. पाकिस्तान में संगीत के मशहूर उस्ताद बाबा किष्टी से उन्होंने संगीत सीखना शुरू किया. संगीत के सुरों की पुख्तगी बढ़ी तो वे लाहौर से सीधे हिंदी सिनेमा की ओर रुख कर दिया.
वे बचपन में लुक छिप कर फ़िल्में देखा करते थे. दिल्ली में जब वह अपने अंकल के घर पर रहते थे, तो उन्हें हीरो बनने के ख्वाब भी आते थे. लेकिन धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी फ़िल्मी संगीत में बढ़ती गयी और संगीत के मुरीद हो गये. खय्याम को पहला मौका उनके गुरु बाबा किष्टी ने ही दिया था. 17 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला संगीत दिया. इसके बाद ही वे मुंबई आये.
उन्होंने पहली बार फ़िल्म हीरा रांझा में संगीत दिया. लेकिन पहचान मिली मोहम्मद रफ़ी के गीत अकेले में वह घबराते तो होंगे से. फ़िल्म शोला और शबनम ने उन्हें संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया. इसके बाद तो वे संगीत में एक से बढ़कर एक कीर्तिमान हासिल करते गये. उस समय गीतकार साहिर लुधियानवी बॉलीवुड में एक अच्छा खासा मकाम रखते थे.
फ़िर क्या था. खय्याम और साहिर ने गीत-संगीत की ऐसी जुगलबंदी पेश की कि उनका संगीत हिंदुस्तान के अवाम की जुबान पर छाने लगा. फ़िल्म कभी-कभी में उन्हें यश चोपड़ा के साथ काम करने का मौका मिला.
वह फ़िल्म सुपरहिट रही .70-80 के दशक में उन्होंने कई हिट संगीत दिये. फ़िल्म उमराव जान का संगीत आज भी लोकप्रिय है. उनके उम्दा संगीत के लिए उन्हें कई अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है. खुद खय्याम बताते हैं कि उस वक्त फ़िल्मों के संगीत को लांच करने की जरूरत नहीं पड़ती थी. क्योंकि फ़िल्मों के गीत इतने लोकप्रिय हो जाते थे, कि वे खुद-ब-खुद लोगों की जुबान पर चढ़ जाते थे.

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