नयी दिल्ली : भारत की बडी आबादी गांवों, कस्बों में बसती है इसलिए बडी कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार प्रसार के लिए ‘गांव चलो’ के सूत्र वाक्य पर अमल कर रही हैं, लेकिन फ़िल्मों से गांव, खेत खलिहान और ग्रामीण परिवेश से जुडे कथानक दूर होते जा रहे हैं.
गुजरे जमाने के अभिनेता मनोज कुमार ने ‘भाषा’ से कहा, ‘‘आज फ़िल्मों से गांव, ग्रामीण परिवेश लगभग गायब हो गया है और काफ़ी कम फ़िल्में ही सामने आई हैं जिनका कथानक सशक्त हो. यही कारण है कि लोग सिनेमाघरों से दूर हो रहे हैं क्योंकि इन फ़िल्मों से वे अपने आप को नहीं जोड पा रहे हैं.’’
उन्होंने कहा कि त्रिलोक जेतली ने गोदान के निर्माता निर्देशक के रूप में जिस प्रकार आर्थिक नुकसान का ख्याल किये बिना प्रेमचंद की आत्मा को सामने रखा, वह आज भी आदर्श है. गोदान के बाद ही साहित्यिक कृतियों पर आधारित फ़िल्मों का मार्ग प्रशस्त हुआ. उन्होंने कहा कि फ़णीश्वरनाथ रेणु की बहुचर्चित कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर आधारित फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ इसमें अग्रणी रही .
ऐसी फ़िल्मों में बदनाम बस्ती, आषाढ का एक दिन, सूरज का सातवां घोडा, एक था चंदर.एक थी सुधा, सत्ताईस डाउन, रजनीगंधा, सारा आकाश, नदिया के पार ओद प्रमुख हैं.
इंटरनेशनल फ़िल्म इंटरप्राइजेज के अध्यक्ष और फ़िल्म संग्रहकर्ता प्रवेश कुमार साहनी ने कहा कि फ़िल्म निर्माण से जुडी रिलायंस इंटरटेनमेंट, फ़ॉक्स स्टार स्टूडियो, वार्नर ब्रदर्स, ईरोस प्रोडक्शन, के सेरा सेरा, क्लाइडोस्कोप एंटरटेनमेंट, मैक्सलैब सिनेमा, शिमारो इंटरटेनमेंट, यशराज प्रोडक्शन, परसेप्ट पिक्चर कंपनी जैसी कंपनियों का जोर आज मल्टीप्लेक्सों और विदेशों में फ़िल्मों के वितरण पर केंद्रित हो गया है.
साहनी ने कहा कि पुराने जमाने में ‘तीसरी कसम से लेकर भुवन शोम’ और अंकुर, अनुभव और आविष्कार तक फ़िल्मों का समानान्तर आंदोलन चला .
इन फ़िल्मों के माध्यम से दर्शकों ने यथार्थवादी पृष्ठभूमि पर आधारित कथावस्तु को देखा.परखा और उनकी सशक्त अभिव्यक्तियों से प्रभावित भी हुए. लेकिन आज फ़िल्म सामाजिक सरोकारों से दूर महज उत्पाद रह गया है.
फ़िल्म कारोबार से जुडे विशेषज्ञ आदित्य चोपडा के अनुसार, ‘‘कंपनियों ने अपने उत्पादों के प्रचार प्रसार और आधार बढाने के लिए ‘गांव चलो’ को सूत्र वाक्य बनाया है. ये कंपनियां सेल्स मैनेजरों एवं अन्य कर्मचारियों को ग्रामीण क्षेत्र में आधार बढाने का लक्ष्य दे रही हैं, लेकिन फ़िल्मों से गांव गायब है, हालांकि निर्माण की दृष्टि से फ़िल्म भी एक उत्पाद ही है.’’
चोपडा ने कहा कि नये दौर में विजय दानदेथा की कहानी पर आधारित फ़िल्म ‘पहेली’ श्याम बेनेगल की ‘ वेलकम टू सज्जनपुर ’ और ‘ वेलडन अब्बा ’ आमिर खान की ‘लगान’, आशुतोष गोवारिकर की ‘स्वदेश’ विशाल भारद्वाज की ‘इश्किया’ जैसे कुछ नाम ही सामने आते हैं जो ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधरित हैं. आज फ़िल्मों में शहरी परिवेश और पश्चिमी सभ्यता का बोलबाला है.
चोपडा ने कहा कि आज कल फ़िल्मों के नाम पर वनस्पति छाप मुस्कान, प्लास्टिक के चेहरों की भोंडी नुमाइश हो रही है, जिसके कारण सिनेमाघरों खासतौर पर छोटे शहरों में से दर्शकों की भीड काफ़ी कम हो गई है.
साहनी ने कहा कि ‘‘धरती के लाल और नीचा नगर’’ के माध्यम से दर्शकों को खुली हवा का स्पर्श मिला और अपनी माटी की सोंधी सुगन्ध, मुल्की समस्याओं एवं विभीषिकाओं के बारे में लोगों की आंखें खुली, उसे विमल रॉय की ‘दो बीघा जमीन’ में आगे बढाया गया.
उन्होंने कहा कि ‘‘देवदास, बन्दिनी, सुजाता और परख’’ जैसी फ़िल्में उस समय बाक्स ऑफिस पर उतनी सफ़ल नहीं रहने के बावजूद फ़िल्मों को भारतीय इतिहास के नये युग का प्रवर्तक माना जाता है.
साहनी ने कहा कि प्रयोगवाद के क्षेत्र में गुरूदत्त की फ़िल्में ‘प्यासा, कागज के फ़ूल तथा साहब, बीबी और गुलाम ऐसी कृतियां है जिनकी याद कभी फ़ीकी नहीं पड सकती. मुजफ्फ़र अली की गमन और विनोद पांडे की ‘एक बार फ़िर’ सशक्त पटकथा और अद्वितीय अभिनय की झलक प्रस्तुत करते हैं.
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